"लोकतंत्र के चार स्तंभ."

 लोकतंत्र के चार स्तंभ


1). पहला स्तंभ (विधायिका): लोकतंत्र का पहला स्तंभ विधायिका है जो कि कानून बनाने का काम करती है लोगों द्वारा चुने गए महत्वपूर्ण व्यक्ति विधायिका के रूप में कानूनों का निर्माण करते हैं तथा पूरी जिम्मेवारी लेते हैं कि जो कानून वे बना रहे हैं वह हर तरह से जनता के हित में हो तथा किसी भी समुदाय का शोषण करने वाला न हो। यह कानून शासक व प्रजा दोनों के लिए मान्य होता हैं।


2.) दूसरा स्तंभ (कार्यपालिका): विधायिका द्वारा बनाए गए कानून को लोगों तक पहुँचाना व कानून को बरकरार रखना कार्यपालिका का काम होता है।


3). तीसरा स्तंभ (न्यायपालिका): बनाए गए कानूनों की व्याख्या करना व कानून का उल्लंघन होने पर सज़ा का प्रावधान करना न्यायपालिका का कार्य होता है। इससे कोई भी व्यक्ति शक्ति के आधार पर कानून का उल्लंघन करने में असमर्थ हो जाता है।



4). चौथा स्तंभ (पत्रकारिता): पत्रकारिता जिसे मीडिया भी कहा जाता है को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में दर्जा मिला है। मीडिया जो कि लिखित, मौखिक या दृश्य किसी भी रूप में हो सकती है जनता को जानकारी देती है कि किस जगह कानूनों का उल्लंघन हो रहा है तथा तीनों स्तम्भ अपनी जिम्मेवारी तथा निष्ठा से कार्य कर रहे हैं या नही। इस जानकारी के पश्चात निर्णय लेने की पूरी शक्ति जनता के विवेक पर निर्भर करती है। मीडिया जो कि जनता तथा शासन दोनों के बीच एक माध्यम का काम करता है लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाता है। अब यह चौथा स्तंभ भी पूरी निष्ठा व जिम्मेवारी से काम करे इसकी जिम्मेवारी जनता की बनती है कि जनता अपने विवेक से मीडिया द्वारा दी गई जानकारी का सही प्रयोग करे। यहीं से लोकतंत्र मजबूत होता है। लोकतंत्र का घेरा लोगों द्वारा बनाई गई विधायिका से चलकर, कार्यपालिका, न्यायपालिका व मीडिया से होते हुए पुनः लोगों के पास ही आ जाता है। इस प्रकार लोकतंत्र इन चार स्तंभो पर टिका है इन चारों स्तंभो की मजबूती मिलकर एक मजबूत लोकतंत्र का निर्माण करती है।

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