कविता - प्रज्ञासूर्या

 हे प्रज्ञासूर्या 

तू छेदलास 

मानवतेला आक्रसणारा

शोषणरुपी दैववाद 

अन् दिधलास नव्याने 

उजेडाचे भाषांतर करणारा

करुणामय धम्मवाद





तू नाकारलीस

माणसा-माणसातील 

विषवल्ली वृत्ती 

अन् निर्मिलीस नव्याने 

अत्तदीप, प्रज्ञा, मैत्रीची

मानवी संस्कृती 

तू घडवलास नव्याने 

मानवी पूर्णांकाचा 

प्रतीत्यसमुत्पाद

अन् रुजवलास इथल्या कणाकणात 

वैश्विक सौहार्दाचा

प्रबुद्ध भारत 

           - आनंद रेखा दिलीप पवार 

              नांदगाव (नाशिक)

               ९४०५३६७४२७



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