धम्म को आपणाना है मगर, धारणाओ का डर है- एक विश्लेषण और उपाय

धम्म को आपणाना है मगर, धारणाओ का डर है- एक विश्लेषण और उपाय.

 इस देश मे बहुत से लोग बुद्ध धम्म को पसंद करते है। वे जाणते है इसमे ना किसीं काल्पनिक ईश्वर की पूजा है, और नाही स्वर्ग नरक जैसी कॊई धारणा या सजा है। यह धम्म मानव के मानसशास्त्रीय वैज्ञानिक पेहलु से जुडा है, जो मानव कल्याण तथा बौद्धिक सामाजिक विकास का उद्देश्य रखता है। वे इस लिये इसे खुल के अपणाने से डरते है, क्यूकी उन्हे लगता है की हमारा धर्म और जाती समाज के लोग हमारे परिवार से अलग होके हमे नाम रखेंगे, हमे धर्म द्रोही कहा जयेंगा मानसिक यात्नाये मिलेगी। विवाह संबंध मे परेशनिया आयेगी इत्यादी बातो से वे डरते है। लेकींन धम्म खुद्द ही इन सभी सामाजिक तथा मानसिक समस्यावो का एकमात्र उचित समाधान है वे इस बात को भूल जाते है।

मे ऊन लोगो को बताना चाहता हू की धम्म किसीं व्यक्ती विशेष या समूह की प्रॉपर्टी नही है, और नाही आपकी मानसिक धारणा का शत्रू। येतो सामाजिक जीवन जीने का एक बेहतर तरिका है, जिसे हम जिना चाहते है। आज दुनिया जीस महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टाईन के सापेक्षता सिद्धांत को आपणाकर वैज्ञानिक शोध मे आगे बढ रही है , उन्होने खुद्द 'बुद्ध धम्म' को आधुनिक समाज जीवन जिने का उत्तम मार्ग बताया है। हमारे आधुनिक भारत के शिल्पकार तथा संविधान के रचनाकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भी बुद्ध धम्म को भारत के तथा दुनिया के उद्धार का मार्ग बताते है। बुद्ध धम्म प्राचीन होणे के बावजूद ये आज भी मार्गदार्शक और आधुनिक वैज्ञानिक कसोटी पर खरा साबीत है। यही दुनिया को आतंकवाद और हिंसा से बाचाने का एकमात्र उपाय है। हमे जीवन एक बार मिलता है, इसे बेझिजक बिना किसीं के दबाव मे जिना ही जिंदगी जिनेका सही अर्थ है। हमारे डर को हम आने वाले पिढी पर क्यू थोपे ? आओ खुल के बेझिजक इस धम्म को आपणाये, .. 
भवतू सब्ब मंगलम !

सिद्धांत राजू नितोने.
अकोला , महाराष्ट्र (भारत)

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